Monday, March 21, 2016

हम सब ढेले है

कभी-कभी बचपन के कुछ किस्से जब याद आते है तो अपने साथ कई मौजूदा सवालो के जवाब भी ले आते है. आज मुझे बचपन के होली के दिन याद रहे थे (कुछ देर मैं इसका कारण भी बता दूँगा). सर्दिया अभी ख़त्म हुई थी और गर्मिया आने वाली थी, मैं और मेरा भाई होली की तैय्यारि कर रहे थे. इस बार हमारा लक्ष्य था की जब पिछली गली के बच्चो का झुंड हमारी गली से गुज़रे तो उन पर खूब गुब्बारे बरसाए जाए, पिछली बार हमारी तैय्यारि थोड़ी कम थी, लेकिन इस बार हमने बड़े-छोटे दोनो तरह के गुब्बारे खरीदे थे जिसे वार अच्छा हो. और वो दिन ही गया. होली के दिन की सुबहा बड़ी अच्छी होती थी, थोड़ी सी ठंड और शांत माहौल, ना जाने कितने बच्चे गुब्बारे लिए दुब्बकर, ताक लगाए बैठ जाते थे. पिछली गली का झुंड आने की आवाज़ से मैं और मेरा भाई तैयार हो गये. जैसे ही झुंड घुसा हमने गुब्बारे बरसाने शुरू कर दिए. खूब भिगोया, मज़ा आया. लेकिन - मिनिट बाद देखा की एक झुंड हम पर पीछे से गुब्बारे बरसा रहा है. अरे! यह पिछली गली के बचे तो यहा से हमे ही मार रहे थे, तो यह लोग कौन थे जिन्हे हमने भिगो दिया. असल मैं जिन बच्चो को हमने गुब्बारे मारे वह किसी और ही गली के बच्चे थे जिनसे पिछली गली वाले बच्चे बच रहे थे.
आप लोग सोचेंगे की बचपन का यह किस्सा कैसे वर्तमान सवालो का जवाब देते हे. आइए उप्र-लिखित किस्से को थोड़ा ओर नज़दीक से समझे. अगर आप जड़ और चेतन के चक्र से थोड़ा उठ जाए तो समझ आएगा की गुब्बारो का तो पिछली गली के बच्चो से कुछ लेना देना नहीं था. तो फिर क्यों वो हमारे हाथ मैं के दूसरो पर गिरने लगे. जिस रंग का गुब्बारा उसी रंग का असर वो दूसरो पर गिराने लगे. क्या हमारा मौजूदा राजनीतिक विमर्श कुछ ऐसा ही नहीं हो गया है. मैं नहीं जानता की १०-२० साल पहले क्या होता था. अगर आज की बात की जाए, तो क्या हम गुब्बारे नहीं बन जाते जिससे कोई भी राजनीतिक दल अपने प्रतिद्वन्दी पर फेक देता है. अगर इस विचार को थोड़े बड़े पेमाने पर ले जाए तो हम सब गुब्बारो की बजाए एक ढेले (सड़क का पथर) की तरह दिखेंगे. जब किसी दल को कुछ नहीं मिलता तो हमे उठा के एक दूसरे पर फेंक देते है. एक उधारण देता हूँ: कुछ दिन पहले एक पोस्ट फ़ेसबुक पर चल रहा था, दो मशहूर हिन्दी के पत्रकारो को लेकर एक सवाल पूछा गया. "बताइए की आपका बेस्ट न्यूज़ एंकर कों है?" जब मैने कॉमेंट्स देखे तो पता लगा की समर्थक एक दूसरे का सिर फोड़ रहे थे. ४०,००० कॉमेंट्स किए जा चुके थे. कुछ लोग तो गालिया भी दे रहे थे. एक पल के लिए लगा की मैं भी अपने एंकेर के पक्ष मैं तोड़ा-तोड़ी करू. लेकिन क्या कुछ कम लिखा गया था, जो कहना चाह रहे थे वह तो कई लोगो ने कह दिया था, तो दोहराने मे क्या लाभ. फिर सोचने लगा की यह पोस्ट किसी ने क्या सोच के डाला होगा. क्या सच मैं कोई दिलचस्पी हैं यह जानने मैं की कौन बेहतर है. थोड़ा ओर जानने के लिए अपने एक मित्र को फोन किया जिन्होने उस पर कॉमेंट किया हुआ था. "क्यों साहब आपने कॉमेंट क्या सोच के किया है?" हैरानी हुई जब पता चला की मेरे दोस्त को याद भी नही था की उसने कॉमेंट किया है. जब याद दिलाया तो बोले- "अरे हाँ, हमने अपने एंकर को वोट दिया". मैने पूछा दूसरे एंकेर को कभी सुना है. बोले-" नही तो? यूही वोट कर दिया? इसमे क्या जानना है. हमारा एंकेर बेस्ट है. " मेने फोन रख दिया. बात थोड़ी समझ मैं आई की ४०,००० लोग ढेले बन चुके थे. लेकिन सवाल और भी गहरा है. की किसने यह मुकाबला किसने डाला होगा. फ़ेसबुक पर ढूँडने की बजाए में खुद से पूछने लगा. जवाब मिला? शायद हाँ, हो सकता है डालने वाले को भी पता ना हो की क्यों डाला? शायद डालने वाला भी एक ढेला हो? इसका मतलब कभी हम ढेले होते हैं और कभी ढेला फेकने वाले. इसलिए यह जाने बिना की वो कौन है जो हमे ढेला बना के फेंकता है, ज़्यादा ज़रूरी यह जानना है की हम कब इस जड़ता मैं चले जाते है की हमे कोई भी फेंक सके.
इसका एक पहलू यह भी है की शायद हम सब लोग कुछ कहना चाहते है. इसलिए एक आसान रास्ते पर निकल जाते है (कॉमेंट्स के). यह आसान है की हम किसी मुद्दे पर बटन दबा कर कॉमेंट कर दें, और यह मुश्किल है की हम उस मुद्दे को पहले समझ लें. आप अपने आप से पूछिए हाल ही के कितने मुद्दो को आपने पहले जाना और फिर राय बनाई. क्या यह सही नहीं है की इधर-उधर से जो सुना उसे अपनी राय बना ली? इस जड़ता को छोड़िए और मुद्दो को पहचानिए. और फिर कहिए. हो सकता है फिर हमे यह ज़रूरी ही ना लगे कि कौन सा एंकेर बेस्ट है. किसी ने क्या खूब कहा है, "हुककममुरन की ज़ुबान खबर है या जो नज़र देखती है वो खबर है.



--नितिन